Dadabhai Naoroji
Poverty and Un-British Rule in India (1901)
नौरोजी का तर्क था कि विदेशी शासन होम चार्जेज़, पेंशन, वेतन और मुनाफ़े के रास्ते भारत की दौलत बाहर ले जाता है और बदले में कुछ नहीं लौटाता। उन्होंने इस निकासी को सालाना लगभग या 3 करोड़ पाउंड से ऊपर आँका, और निर्यात के बेहिसाब मुनाफ़े, भाड़े और बीमे को जोड़कर 4 करोड़ पाउंड के करीब, जबकि 1800 के आसपास यह लगभग 30 लाख पाउंड सालाना थी। ये उनके मोटे अनुमान हैं, जो ब्रिटिश नीति के ख़िलाफ़ एक राजनीतिक मुक़दमे के हिस्से के रूप में रखे गए थे।
स्रोत: Naoroji, Poverty and Un-British Rule in India (London: Swan Sonnenschein, 1901), introduction
Utsa Patnaik
'Revisiting the Drain, or Transfers from India to Britain in the Context of Global Diffusion of Capitalism', in Chakrabarti and Patnaik (eds), Agrarian and Other Histories (2017)
पटनायक 1765 से 1938 तक की निकासी को 9.2 लाख करोड़ पाउंड, यानी 45 लाख करोड़ डॉलर आँकती हैं। उनका तरीका, उनके अपने शब्दों में: भारत की निर्यात अधिशेष की कमाई को पैमाना मानना और उस पर 5 प्रतिशत की कम ब्याज दर से चक्रवृद्धि जोड़ना। यानी इस कुल रकम में पूरा निर्यात अधिशेष निकासी माना गया है, और यह ब्याज समेत आज के हिसाब की रकम है, उस ज़माने में बाहर गई रकम नहीं।
स्रोत: Utsa Patnaik on Agrarian History and Imperialism, interview, Review of African Political Economy, 7 March 2019 · परोक्ष स्रोत (Her figure and method in her own words; the essay itself was not read.)
Jason Hickel
'How Britain stole $45 trillion from India', Al Jazeera, 19 December 2018
इस संपादकीय लेख ने पटनायक का आँकड़ा आम पाठकों तक पहुँचाया। हिकेल का तर्क है कि भारतीय निर्यातकों को असल में उन्हीं से वसूले गए कर से भुगतान किया जाता था, और इस प्रवाह ने ब्रिटेन और पश्चिमी दुनिया के बड़े हिस्से के औद्योगीकरण में मदद की। वे पटनायक का ही आँकड़ा और तरीका दोहराते हैं, यह कोई अलग अनुमान नहीं है।
यह एक मत-लेख है, समकक्ष-समीक्षित शोध नहीं।
स्रोत: Hickel, 'How Britain stole $45 trillion from India', Al Jazeera, 19 December 2018
Tirthankar Roy
'Did the British loot India?', History Reclaimed, 2 November 2022
रॉय के अनुसार पटनायक का दावा बेहद कमज़ोर अर्थशास्त्र पर टिका है और उसे परखा ही नहीं जा सकता। उनका तर्क है कि उन्नीसवीं सदी के लगभग सारे भुगतान बाज़ार के सौदों के बदले थे, जैसे लंदन में कम ब्याज पर लिए गए कर्ज़ की अदायगी, और कि होम चार्जेज़ राष्ट्रीय आय के शायद ही कभी एक प्रतिशत से ऊपर गए। 45 लाख करोड़ डॉलर के बारे में वे लिखते हैं कि यह आँकड़ा जिस चीज़ को नापता है उसकी परिभाषा ही नहीं की जा सकती। रॉय एलएसई में आर्थिक इतिहास के प्रोफ़ेसर हैं, पर यह लेख किसी समीक्षित शोध-पत्रिका में नहीं, साम्राज्य का बचाव करने वाली एक मत-आधारित वेबसाइट पर छपा था।
यह एक मत-लेख है, समकक्ष-समीक्षित शोध नहीं।
स्रोत: Roy, 'Did the British loot India?', History Reclaimed, 2 November 2022
K. N. Chaudhuri
'India's International Economy in the Nineteenth Century: An Historical Survey', Modern Asian Studies 2(1), 1968, 31-50
भारत के बाहरी लेन-देन का एक सर्वेक्षण। रॉय इसे निकासी के दावे की सावधान जाँच और उसका खंडन मानते हैं, और चौधरी को इस बात का श्रेय देते हैं कि उन्होंने उस मान्यता की कमज़ोरी दिखाई कि जो पैसा ब्रिटेन नहीं जाता वह भारत में ही निवेश होता। चौधरी का मत यहाँ वैसे ही दिया गया है जैसे रॉय उसे बताते हैं।
स्रोत: Chaudhuri, 'India's International Economy in the Nineteenth Century: An Historical Survey', Modern Asian Studies 2(1), 1968, 31-50 · परोक्ष स्रोत (Not read; his stance comes from Roy's account.); Roy, 'Did the British loot India?', History Reclaimed, 2 November 2022